भदोही जिले के बरमोहनी गांव में हुई विद्यासागर दीक्षित की भुखमरी से मौत सिस्टम में व्याप्त करप्शन का एक जीता जागता उदाहरण है। उसकी मौत से भले ही उसकी पत्नी हीरामती पर विपदा का पहाड़ टूट पड़ा हो किन्तु किसी नेता या अधिकारी पर कोई प्रभाव दिखायी नहीं देता। यदि मृतक ब्रह्मण न होकर दलित होता तो जिलाधिकारी, सांसद और विधायक झूठी सहानुभति बटोरने के लिये नंगे पांव दौड़ लगा दिये होते, किन्तु इस मौत से उनके उपर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
देखा जाय तो सरकार की नजर में कोई भी सवर्ण गरीब नहीं होता, बल्कि वह दूसरों पर अत्याचार करने वाला आतताई है। किसी सवर्ण के प्रति सरकार या अधिकारियों की सोच कभी सकारात्मक नहीं होती है। मृतक विद्यासागर का दुर्भाग्य है कि वह सवर्ण था। भले ही रिश्वत न देने के काराण उसे प्रधान द्वारा आवास नहीं दिया गया। सपा सरकार के बाद यदि राशन कार्ड से उसका नाम हटा दिया गया तो इसके पीछे भी सुविधा शुल्क कारण रहा होगा।
टूटी फूटी झोपड़ी में फांके करके दिन गुजारने वाला विद्यासागर दीक्षित ने गरीबी और भुखमरी से त्रस्त होकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। लेकिन उसकी पत्नी के उपर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा है। यदि मृतक सवर्ण न होकर दलित रहा होता तो उसके दरवाजे पर पूरा प्रशासन जुट गया होता। अधिकारी योगी सरकार के सवालों का जवाब देने में व्यस्त होते। सांसद और विधायक ही नहीं बल्कि विपक्ष के नेता भी अपनी झूठी सहानुभूति व्यक्त करने के लिये लाइन लगा दिये होते, किन्तु मृतक के घर कोई इसलिये नहीं जायेगा क्योंकि वह ब्राह्मण था। सरकार को उसके मरने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।
सरकार और जनप्रतिनिधियों की यहीं सोच समाज को बांटने का काम कर रही है। सामाजिक समानता के खोखले नारे लगाने वाले ऐसे मौके पर चुप्पी साधकर अपनी मानसिकता का प्रदर्शन कर देते हैं। जबकि अधिकारियों को चाहिये कि इस बात की जांच करें जब वह इतनी गरीबी में दिन गुजार रहा था फिर उसका राशन कार्ड क्यों निरस्त किया गया। जो व्यक्ति अपनी दो वक्त की रोटी के लिये मोहताज था उसे आवास क्यों नहीं दिया गया।









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