तृतीय दिवस की कथा का आरंभ पूज्य श्री काशी धर्म पीठाधीश्वर जी महाराज ने मंगलाचरण एवं वेद-मंत्रों के उच्चारण के साथ किया। समस्त श्रद्धालु भक्ति-भाव से कथा-पंडाल में उपस्थित रहे।
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1. सृष्टि की उत्पत्ति का दिव्य वर्णन
महाराज जी ने बताया कि जब सृष्टि का प्रलय होता है, तब सम्पूर्ण ब्रह्मांड जल में विलीन हो जाता है। उस समय भगवान श्रीहरि योगनिद्रा में क्षीरसागर में शेषनाग पर विराजमान रहते हैं।
भगवान की नाभि से प्रकट हुए कमल से ब्रह्मा जी का आविर्भाव होता है। ब्रह्मा जी तप करके भगवान का दर्शन करते हैं और उनके आदेश से सृष्टि की रचना प्रारंभ करते हैं।
इससे महाराज जी ने यह शिक्षा दी कि
सृष्टि का कर्ता कोई जीव नहीं, स्वयं भगवान हैं।
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2. पंचभूत एवं जीव की रचना
भगवान की इच्छा से
आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी — इन पंचमहाभूतों की उत्पत्ति हुई।
फिर इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहंकार की रचना हुई।
महाराज जी ने कहा —
जब जीव अहंकार में फँसता है, तब वह जन्म-मरण के बंधन में पड़ता है।
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3. नारद जी का पूर्व जन्म और भक्ति की महिमा
तृतीय दिवस की कथा का अत्यंत भावुक प्रसंग देवर्षि नारद जी का था।
पूज्य महाराज जी ने बताया कि नारद जी अपने पूर्व जन्म में एक दासी पुत्र थे। उन्होंने बाल्यावस्था में संतों की सेवा की, उनके चरण धोए, बचा हुआ प्रसाद ग्रहण किया और हरिकथा का श्रवण किया।
उसी सेवा और कथा-श्रवण के प्रभाव से—
•उनके हृदय में भक्ति जागृत हुई
•अगले जन्म में वे देवर्षि नारद बने
महाराज जी ने स्पष्ट कहा —
संत सेवा और हरिकथा जीवन को बदल देती है।
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4. भक्ति का स्वरूप
पूज्य पीठाधीश्वर जी ने बताया कि सच्ची भक्ति —
•निष्काम होती है
•अहंकार रहित होती है
•केवल भगवान को पाने की इच्छा से की जाती है
उन्होंने कहा —
भगवान को धन, बल या विद्या से नहीं,
केवल प्रेम और भक्ति से पाया जा सकता है।
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5. प्रह्लाद चरित्र की भूमिका
तृतीय दिवस में प्रह्लाद महाराज की कथा की भूमिका रखी गई।
महाराज जी ने बताया कि जब संसार में अत्याचार बढ़ता है और भक्तों पर संकट आता है, तब भगवान नृसिंह अवतार धारण कर भक्तों की रक्षा करते हैं।
भगवान अपने भक्त की रक्षा के लिए किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं।
6. कलियुग में उद्धार का सरल मार्ग
पूज्य महाराज जी ने विशेष रूप से कलियुग के लिए कहा —
•तप कठिन है
•यज्ञ संभव नहीं
•ध्यान स्थिर नहीं
हरिनाम संकीर्तन ही सबसे सरल और प्रभावी साधन है।
उन्होंने कहा —
“नारायण-नारायण का नाम ही इस युग की नौका है।”
7. संकीर्तन और कथा का समापन
कथा के अंत में हरिनाम संकीर्तन हुआ।
पूरा पंडाल —
“नारायण नारायण”
और
“हरि बोल”
के जयघोष से गूंज उठा।
श्रद्धालुओं की आँखों में आँसू और हृदय में भक्ति का सागर उमड़ पड़ा
पूज्य श्री के कथा के पूर्व काशी धर्मपीठ परंपरानुसार पादुका पूजन वैदिक विधि विधान से सम्पन्न हुआ।।








