आज हालात ऐसे है की, आप हम बाते करें तो यही सवाल जवाब होता हैं। कैसे हैं भैया..?? ठीक हैं ना..जवाब अक्सर यही होता हैं बहुत ठीक नहीं हैं, धंधा पानी ठंडा/मंदा हैं क्या बताऐ… ये रोना तो सचमुच का रोना हो गया हैं साहब महंगाई इस कदर अपने चरम पर हैं, दूजे बेरोजगारी और मंदी की मार झेलती हमारी अर्थव्यवस्था। जहां आम आदमी के थाली से एक-एक व्यजंन नदारद रहने लगे। खाने की थाली से दूध, सालाद, पापड़ और अचार तो दूर, अगर दाल-चावल और रोटी सहित चटनी मौजूद हैं तो समझिए आप खुशनसीब हैं। महंगाई का सबसे बड़ा कारण बढ़ती जनसंख्या और घटता उत्पादन हैं यह सच भी हैं। पर देश मे जमाखोरी भी भी मंहगाई का सबसे बड़ा कारण हैं। सरकारी गोदामों मे खाद्यान्नों का रख रखाव की अनुचित व्यवस्था के कार हजारों टन अनाज का सड़ जाना ऐसी ही लापरवाहियां भी जिम्मेदार हैं महंगाई के लिए।
एक सर्वे के अनुसार भारत मे गरीबी रेखा के नीचे जीवन व्यापन करने वालें की दैनिक मजदूरी करने वालोँ की मजदूरी भी सौ, या दो सौ से अधिक नहीं हैं। अब ऐसे मे क्या खाऐ और क्या बचाऐ? भारतीय मुद्रा का गिरता स्तर वैश्विक मंदी की दुहाई, से पेट्रोल, डिजल की बढ़ोतरी तो समझ मे आता हैं पर खाद्यान्न तेलोंऔर रसोई गैस मे लगी महंगाई की आग में झूलस रहा आम आदमी किसकी दुहाई दे। हमारी आर्थिक उदारीकरण, और विदेश नीती आयात, और निर्यात, पूंजीवाद, उद्योग, व्यापार को आखिर क्या हो गया जो देश विश्वगुरू बनने की ओर अग्रसर हो, जिसका सबसे बड़ा मुद्दा ही मंहगाई, बेरोजगारी हो उसे अपने देश की भविष्य की चिंता पहले करनी होगी। बाकी स्थिति पर हम सबल हैं, बाजारों मे सन्नाटा करोना को लेकर भी है, अफवाहों ने हमारे त्यौहार होली के रंग को फिका कर रखा हैं। रिक्शा और टैक्सी ड्राइवर, आम मजदूर और सामान्य कामकाजी लोग तो बस एक भाषा समझते हैं, की नयी सरकार हैं कुछ नया करेगी और कुछ विकल्प निकलेगा, पर होता हमेशा उल्टा ही हैं।
यह दुर्भाग्य ही देश का जहां आज भी तमाम मुद्दे को लेकर लोग रोज सड़को पर उतर रहे हो। वहां देश के सबसे बड़े मुद्दों को सदन मे इतने गंभीरता से भी नहीं लेते महज खानापूर्ति की प्रक्रिया से सदन मे वाद,विवाद तक सीमित रखते है। सदन मे ही कैंटीन की थाली से जो हमारी आम थाली से कई गुनी सस्ती थाली हैं।उससे मंहगाई की तुलना करते हमारे जनप्रतिनिधि पक्ष और विपक्ष पर खूब लड़ते है।








[…] एक तो महंगाई का रोना,,,ऊपर से कोरोना […]
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