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    विदेश से चुनाव प्रचार करने वाले पहले नेता मोदी का देश पर कितना असर

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    बचपन से यहीं सुनता आ रहा हूंकि किसी अभिनेता द्वारा ही शो किया जाता है। चाहे वह छोटा शो हो या फिर मेगा शो, लेकिन पहली बाद देख रहा हूं कि हमारे देश के प्रधानमंत्री ब्रिटेन में जाकर मेगा शो कर रहे हैं। इस मेगा शो में भी वहीं कुछ हुआ जो विदेशों में जाकर मोदी जी करते आये हैं। जब वे देश में सभी को संबोधित करते हैं तो कम पढ़े लिखे लोग कड़ी धूप में खड़े होकर तालिया बजाते हैं और विदेश में जाकर शो करते हैं तो पढ़े लिखे लोग भी बजाते हैं। मोदी जी को शायद अच्छी तरह पता है कि जब वे विदेशों में संभ्रान्त्र वर्ग से तालियां बजवाते हैं तो देश के आम लोग तो यहीं सोचेगे कि मोदी जी सब सच ही कहते होंगे। कभी कभी मैं सोचता हूं कि शो आखिर होता क्या है। एक अभिनेता जब शो करता है तो वह अपने चेहरे झूठे भाव लाकर टिकट लेकर आयी जनता को खुश करता है, लेकिन मोदी जी के चेहरे को देखकर यह समझ में नहीं आता कि वे कितना सच बोल रहे हैं। हां उनके चेहरे के भाव देखकर बालीवुड के बड़े बड़े अभिनेता यह सोचने को अवश्य मजबूर होते होंगे कि यह बंदा यदि अभिनय के क्षेत्र में आ गया होता तो कभी भी अ​मिताभ बच्चन मेगा स्टार नहीं बन पाते।
    अब आईये बात करते हैं देश की राजनीति पर एक साल राजनीति में काफी लंबा अरसा होता है। एक साल पहले भाजपा की अगुवाई में एनडीए ने उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 में से 325 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया था। पार्टी का यह प्रदर्शन राज्य में उसके लोक सभा चुनाव के प्रदर्शन के मुताबिक ही था। तब एनडीए को 80 में से 71 लोक सभा सीटों पर जीत मिली थी। इस तरह अगर 2014 पहला संकेत था कि भाजपा देश की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक पार्टी है तो 2017 में विधानसभा चुनाव से इस बात की फिर पुष्टि हुई थी।
    यही वजह है कि पिछले माह उत्तर प्रदेश में हुये दो सीटों पर उपचुनाव में भाजपा की हार खासी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस समय में केंद्र में भाजपा की सरकार है। उत्तर प्रदेश में भी वही सत्ता में है। इन परिस्थितियों के बीच मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री द्वारा छोड़ी गई सीटों – गोरखपुर और फूलपुर में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा है। देश में अब तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं था जब किसी मुख्यमंत्री द्वारा छोड़ी गई लोक सभा सीट पर उसकी पार्टी चुनाव हारी हो।

    इसमें कोई दो राय नहीं कि उपचुनाव को आमचुनाव की तरह नहीं देखा जा सकता, लेकिन फूलपुर सीट पर करीब 60 हजार वोटों और गोरखपुर में करीब 22 हजार वोटों से भाजपा की हार दिखाती है कि अब पार्टी पर ‘संतुलन का नियम’ लागू हो रहा है। यानी कि अतीत में पार्टी यहां अपने पक्ष में प्रचंड लहर देख चुकी है और अब उसकी स्थिति नीचे ही आनी है।
    यहां भाजपा की हार का सीधा और पहला कारण तो यही जान पड़ता है कि समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने मिलकर यह चुनाव लड़ा था, लेकिन सत्ताधारी पार्टी की हार का यह अकेला कारण नहीं है। 2014 के लोक सभा चुनाव में गोरखपुर सीट पर भाजपा को 51.8 प्रतिशत वोट मिले थे। वहीं बसपा और सपा दोनों के कुल मिलाकर 39.6 प्रतिशत वोट थे। वहीं पिछले आम चुनाव में फूलपुर में भाजपा को 52.43 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि सपा-बसपा को 37.38 प्रतिशत वोट मिले थे। ये आंकड़े बताते हैं कि ताजा चुनाव में मतदाताओं का निर्णायक रुझान सपा और बसपा के पक्ष में रहा है।
    इन नतीजों की एक वजह नोटबंदी और जीएसटी भी हो सकती है। इन दोनों की वजह से छोटे व्यापारियों को काफी तकलीफ झेलनी पड़ी है। नोटबंदी के बाद खेती-किसानी पर आया संकट आज भी पूरी तरह दूर नहीं हुआ है और उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे भारत में इसने किसानों में आक्रोश पैदा किया है।
    वहीं बिहार में अररिया लोक सभा सीट पर हुए उपचुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने भाजपा-जदयू के उम्मीदवार को हराया है। इस नतीजे ने दिखाया कि जो सच में प्रभावशाली पार्टियां हैं, उनका गठबंधन किस तरह कारगर साबित होता है। इससे पहले बिहार विधानसभा चुनाव में गठबंधन की यही ताकत राजद और जदयू साबित कर चुके हैं।
    भारतीय जनता पार्टी सिर्फ पीएम मोदी के जादू पर ही आगे भी चुनाव जीतने की उम्मीद पाले हुये हैं, लेकिन आम जनता जमीन पर बदलाव देखना चाहती है। अपराध रूकने का नाम नहीं ले रहा है। विकास के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। कागजों पर विकास की झड़ी लगी है किन्तु जमीनी स्तर पर सच अलग ही है। विधायक और सांसद अपनी पीठ खुद ही थपथपाने पर लगे हैं। अंधभक्त लोगों को गालियां देने और राष्ट्रद्रोही बताने समय जाया कर रहे हैं। अधिकारी मनमानी पर हैं जिससे भ्रष्टाचार चरम पर है। थानों और तहसीलों पर दलाल पहले से अधिक बढ़ गये है और मोदी जी जमीनी हकीकत से दूर विदेशों से चुनाव प्रचार कर रहे हैं।
    सबकुछ मिलाकर यहीं दिख रहा है कि विपक्ष की नाकमियों के कारण मोदी के आगे कोई मजबूत विकल्प नहीं है जिससे लोकसभा का आमचुनाव भी भाजपा जीत सकती है, लेकिन उपचुनाव में आये नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि आने वाला 2019 का आमचुनाव भाजपा के लिये आसान नहीं होगा।